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जबलपुर. संतोष सिंह18 मिनट पहले

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  • मेडिकल कॉलेज में सात मार्च को मिली थी आखिरी लाश
  • मेडिकल में एक शव पर 50 से 60 एमबीबीएस छात्र करते हैं प्रेक्टिकल
  • 10 का है नियम, हर साल 18 बॉडी की जरूरत, 2-3 का छू पाते हैं आंकड़ा

डॉक्टर बनने की पढ़ाई पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। एमबीबीएस में मानव संरचना (एनॉटामिक) पर 670 घंटे की पढ़ाई होती है। इसके लिए ह्यूमन बाडी की जरूरत पड़ती है। इसी बॉडी की संरचना से छात्र रिसर्च कर हर अंगों की उपयोगिता सीखते हैं। जबलपुर मेडिकल कॉलेज में कोरोना के चलते पिछले सात महीने से एक भी लाश नहीं मिली। मजबूरी ऐसी कि एक लाश पर 50 से 60 छात्र प्रेक्टिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। जबकि नियम 10 छात्रों पर एक लाश का है। मेडिकल में 180 सीट है। हर साल 18 से 20 ह्यूमन बॉडी चाहिए, लेकिन दो से तीन ही मिल पाती है। छात्रों की इस समस्या को अब थ्रीडी वर्चुअल डिसेक्टर से दूर करने की तैयारी है।
मार्च में मिली थी आखिरी बॉडी
मेडिकल कॉलेज को आखिरी ह्यूमन बॉडी मार्च 2020 के पहले सप्ताह में मिली थी। इसके बाद कोरोना गाइडलाइन आ गई। इसकी शर्ते और प्रक्रिया इतनी कठोर है कि सात महीने में एक भी बॉडी नहीं मिल पायी। शासन की गाइड लाइन है कि मेडिकल के शरीर रचना विभाग में 10 प्रशिक्षु डॉक्टरों पर एक ह्यूमन बॉडी रिसर्च क लिए होना चाहिए। वर्तमान में यहां 180 प्रशिक्षु डॉक्टर हैं, जो वर्ष 2021 में बढ़कर 250 हो जाएंगे। तब प्रशिक्षु डॉक्टरों को और मुश्किल आनी है।
20 मार्च को जारी हुई थी कोरोना गाइडलाइन
कोरोना संक्रमण के चलते आईसीएमआर (भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परषिद) ने 20 मार्च 2020 को कोरोना गाइडलाइन जारी की थी। गाइडलाइन के अनुसार देहदान वाली बॉडी की मृत्यु स्वभाविक (नेचुरल) होनी चाहिए। आरटी-पीसीआर की रिपोर्ट निगेटिव (कोरोना रिपोर्ट) हो। डॉक्टर लिखकर दें कि मृत्यू से 20 दिन पूर्व मृतक पूरी तरह से स्वस्थ्य था, तभी मेडिकल कॉलेज में बॉडी दान की जा सकती है। एक बॉडी दो से तीन वर्ष तक रखी जाती है। ऐसे में गाइडलाइन का सख्ती से पालन न होने पर छात्रों के संक्रमण का बड़ा खतरा रहेगा।
तीन वर्ष तक सुरक्षित रखते हैं एक बॉडी
मेडिकल कॉलेज में शरीर रचना विभागाध्यक्ष डॉ. एनएल अग्रवाल के मुताबिक एक हृयूमन बॉडी को तीन वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। अभी मेडिकल कॉलेज में 15 बॉडी है। एक वर्ष में दो से तीन बॉडी को ही रिसर्च के लिए छात्रों को दे पाते हैं। कई बार ऐसा भी हुआ है कि पूरे वर्ष एक भी बॉडी नहीं मिलती। ऐसे में छात्रों की पढ़ाई ही बाधित हो जाएगी। बॉडी को सुरक्षित करने के लिए केमिकल प्रोसेसिंग होती है। एक विशेष फ्लूड को ब्लड में इंजेक्ट कर देते हैं। इससे बॉडी धीरे-धीरे फिक्स हो जाती है। फिर इसे केमिकल से भरे बड़े-बड़े टैंक में डाल देते हैं। एक से तीन वर्ष तक बॉडी रख सकते हैं।
ह्यूमन बॉडी इस कारण है जरूरी
डॉ. अग्रवाल के मुताबिक नीट क्लीयर करने के बाद एमबीबीएस में प्रवेश लेने वाले छात्रों को मानव संरचना पढ़ाया जाता है। इसके बिना वे आगे बढ़ ही नहीं पाएंगे। मानव के एक-एक अंग की संरचना कैसी होती है। यह किस तरह काम करता है। नार्मल किडनी कैसे दिखती है। फेफड़ा कैसे काम करता है। इसे जानने के बाद ही वह आगे की पढ़ाई कर पाएगा। एमबीबीएस की यह बेसिक साइंस पढ़ाई है। पहले दो वर्ष इसकी पढ़ाई होती थी। 1998 से एक वर्ष कर दिया गया। कुल 670 घंटे इसकी पढ़ाई होती है। बॉडी की कमी के चलते प्लास्टिक बॉडी से अंगों के बारे में पढ़ाया जाता है।
अब थ्रीडी वर्चुअल डिसेक्टर से होगी पढ़ाई
शरीर रचना विभागाध्यक्ष डॉ. एनएल अग्रवाल ने बताया कि ह्यूमन बॉडी की समस्या को देखते हुए नेशनल मेडिकल कमीशन ने वर्चुअल डिसेक्टर खरीदने के निर्देश दिए हैं। थ्रीडी वर्चुअल डिसेक्टर की कीमत एक करोड़ से अधिक है। डीन और मेरे स्तर से डिमांड भेजी जा चुकी है। मानव संरचना की बारीक से बारिक चीजें भी इसमें दिखेगा। इससे छात्रों की मानव संरचना सम्बंधी पढ़ाई बाधित नहीं होगी।
देहदान के लिए हर महीने दो फॉर्म ले जाते हैं
मेडिकल कॉलेज से हर महीने एक से दो फॉर्म देहदान के लिए लोग ले जाते हैं। एक साल में औसतन 10-12 लोग फॉर्म जमा भी करते हैं। पर अक्सर बॉडी देने की बारी आती है तो परिजन सूचना ही नहीं देते। मृत शरीर पर परिजनों का अधिकार होता है। बिना उनकी अनुमति के बॉडी नहीं ली जा सकती।
ये है देहदान की प्रक्रिया
– देहदान का पहले से फार्म भरा हो या फिर परिजन स्वेच्छा से ऐसा चाहते हों।
– इसके लिए जरूरी है कि मौत की वजह नेचुरल हो।
– किसी तरह की बीमारी न रही हो।
– सामान्य मौत होने की बात ऑन रिकॉर्ड डॉक्टर लिखकर देंगे।
– पुलिस लिखकर पंचनामा देगी कि मृत्यु पर संदेह नहीं है।
– स्थानीय पुलिस की एक रिसीविंग कॉपी देनी होती है।
– परिवार के मुखिया का आधार कार्ड नम्बर देना होता है।
– बॉडी मिलने के बाद एचओडी अपने थाने को पत्र लिखकर परिवार की विस्तृत सूचना देगा।
– कोरोना संक्रमण कॉल में आरटी-पीसीआर की की निगेटिव रिपोर्ट हो।
– साथ में डॉक्टर लिखकर दें कि मृत्यू से 15-20 दिन पूर्व मृतक स्वस्थ्य था।



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